नगर पंचायत ईओ और लेखपाल की ‘जुगलबंदी’ से सरकारी जमीन का हो रहा बंटवारा।
नगर पंचायत या लूट का अड्डा।
संविधान रक्षक जिला संवाददाता उमेश तिवारी बाराबंकी
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बाराबंकी! सिद्धौर नगर पंचायत में इन दिनों भ्रष्टाचार का एक ऐसा नंगा नाच चल रहा है, जिसे देख कर आम आदमी का सिर शर्म से झुक जाए। एक तरफ सरकारी जमीनें भू-माफियाओं के हवाले की जा रही हैं, तो दूसरी तरफ सफाई के नाम पर लाखों रुपये का गबन कर जनता की आंखों में धूल झोंकी जा रही है। इस पूरे ‘भ्रष्ट कारनामे’ के दो मुख्य किरदार हैं—ईओ आशुतोष त्रिपाठी और उनके ‘खास’ लेखपाल। इनकी जुगलबंदी ने सिद्धौर को भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला बना दिया है।
वहीं ईओ आशुतोष त्रिपाठी स्वच्छता के ‘कागजी सुल्तान’
सिद्धौर नगर पंचायत के सर्वेसर्वा ईओ आशुतोष त्रिपाठी की कार्यशैली चर्चा का विषय बनी हुई है। लाखों-करोड़ों का सफाई बजट आता है, टेंडर होते हैं, लेकिन जमीन पर सफाई का नामोनिशान तक नहीं है। डोमेन गड्ढा तालाब की तस्वीरें को देखिए, यह ईओ साहब की कार्यक्षमता का जीता-जागता सबूत हैं। क्या ईओ साहब को अपने दफ्तर से बाहर निकलकर देखने की फुर्सत नहीं है? या फिर उनका ध्यान केवल बजट को ‘एडजस्ट’ करने और अपनी तिजोरी भरने में लगा है?
आपको बता दें कि सिद्धौर की जनता का आरोप है कि ईओ साहब ने अपने कार्यकाल में सफाई को एक धंधा बना लिया है। कागजों में तालाबों की सफाई होती है, लेकिन हकीकत में वे जलकुंभी के महासागर बन चुके हैं। यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि जनता के टैक्स के पैसों की सरेआम लूट है।
जो लेखपाल और ‘नोटिस के व्यापार से सरकारी जमीन बेचने की दुकानबन चुकी है।
वहीं दूसरी ओर लेखपाल महोदय का खेल तो और भी निराला है। ऐसा लगता है कि सरकारी जमीनें उनकी ‘निजी संपत्ति’ हो गई हैं। सिद्धौर की आधी से ज्यादा सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा हो चुका है, लेकिन मजाल है कि लेखपाल साहब की कलम से कोई ठोस कार्रवाई हो जाए!
साथ ही सेलेक्टिव कार्रवाई का खेल: ग्रामीणों का आरोप है कि लेखपाल साहब ने ‘नोटिस का व्यापार’ खोल रखा है। जो उन्हें ‘नजराना’ दे देता है, उसकी जमीन सुरक्षित है—वहां कोई नोटिस नहीं, कोई कार्रवाई नहीं।
गरीबों पर डंडा जो कॉलोनी गरीब या बेवा लाचार व्यक्ति उनकी अवैध मांगों को पूरा करने में असमर्थ है, उसे तुरंत नोटिस थमा दिया जाता है। वहीं मिलीभगत का खेल: आधे से ज्यादा सरकारी जमीन माफियाओं के कब्जे में है, लेकिन लेखपाल अपनी जेब गर्म करके मौन धारण किए बैठे रहते हैं।
सिद्धौर बना ‘भ्रष्टाचार का गढ़’ ईओ आशुतोष त्रिपाठी और लेखपाल की यह जोड़ी अब सिद्धौर वासियों के लिए ‘नासूर’ बन चुकी है। सरकार द्वारा चला रहे स्वच्छता अभियान पर नगर पंचायत प्रश्न चिह्न की ओर बढ़ रहा है जहां एक तरफ जलकुंभी से पटे तालाब हैं, जो बीमारियों को न्योता दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ सरकारी जमीनों पर रसूखदारों के कब्जे। क्या इन अधिकारियों को डर नहीं लगता? या इनका नगर पंचायत से लेकर जिले तक खौफ़ का इतना संरक्षण प्राप्त है कि इन्हें किसी का भय नहीं है?
जनता का तल्ख सवाल: कब तक चलेगा ये तमाशा?
अब सिद्धौर की जनता जाग चुकी है। तस्वीरें इस बात का प्रमाण हैं कि व्यवस्था पूरी तरह से फेल हो चुकी है। अब यह खेल और अधिक नहीं चलेगा। ईओ आशुतोष त्रिपाठी साहब अब वक्त आ गया है कि या तो आप अपनी कार्यशैली बदलें और इन तालाबों को जलकुंभी से मुक्त करें, वरना जनता का गुस्सा आपको कुर्सी से उतारने के लिए काफी है। और लेखपाल जी, आपकी ‘नोटिस वाली दुकान’ का भंडाफोड़ होने वाला है। जो आपने गरीब जनता के साथ अन्याय किया है, उन असहाय निर्धन गरीब बेवा माओं की कालोनी का नोटिस थमा उक्त चहेतों को बचाया है उसका हिसाब अब ऊपर तक होगा। सरकारी जमीन पर रासुखदारों व धनपति लोगों द्वारा कब्जा करने वालों को संरक्षण देना बंद करें, वरना आने वाला कल आपके और आपके आकाओं के लिए बहुत भारी पड़ने वाला है! यह सिर्फ एक खबर नहीं, जनता की चेतावनी है। अभी मामला डीएम कार्यालय से लेकर यह मामला सीधे लखनऊ और मुख्यमंत्री कार्यालय की दहलीज पर होगा।


