बस्ती। जिला पंचायत राज अधिकारी घनश्याम सागर एक बार फिर चर्चा में हैं। आरोप है कि उन्होंने ग्रामीण सफाई कर्मचारी संघ के असली और नकली जिलाध्यक्ष की पहचान किए बिना ही विवादित सूची शासन को भेज दी। इस मामले को लेकर जिले में तरह–तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं और सफाई कर्मचारियों में नाराजगी भी देखी जा रही है।
बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश पंचायती राज ग्रामीण सफाई कर्मचारी संघ के जिला अध्यक्ष पद को लेकर पहले से ही विवाद चल रहा है और इस पद के लिए दो अलग–अलग चुनाव कराए जाने का दावा किया जा रहा है। निर्वाचित जिलाध्यक्ष पेशकार और महामंत्री अतुल कुमार पाण्डेय ने पूरे मामले की शिकायत उच्च अधिकारियों से करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
शिकायतकर्ताओं के अनुसार संघ के प्रांतीय कार्यालय द्वारा 17 दिसंबर 2025 को जारी पत्र के माध्यम से जनपद बस्ती में द्विवार्षिक अधिवेशन कराने के लिए सिद्धार्थनगर के जिलाध्यक्ष रणजीत कुमार को चुनाव अधिकारी नियुक्त किया गया था। आरोप है कि 25 दिसंबर 2025 को होने वाले नामांकन की सूचना न तो सार्वजनिक रूप से जारी की गई और न ही स्थान की जानकारी दी गई। यहां तक कि जिला मंत्री मनोज चौहान, कोषाध्यक्ष पेशकार और संगठन मंत्री रामकृपाल चौधरी सहित कई पदाधिकारियों को भी इसकी जानकारी नहीं दी गई।
शिकायत में कहा गया है कि 24 दिसंबर 2025 को जिला पंचायत राज अधिकारी कार्यालय में प्रदेश संगठन से आए पत्र को प्राप्त कराने के बाद 25 दिसंबर को बंद कमरे में नामांकन प्रक्रिया पूरी कर ली गई। इस प्रक्रिया की जानकारी न तो किसी समाचार पत्र में प्रकाशित की गई और न ही व्हाट्सएप समूहों में साझा की गई। साथ ही चुनाव के लिए डीपीआरओ से अनुमति लेने और जिले के सफाई कर्मचारियों की सत्यापित सूची मंगाने की प्रक्रिया भी नहीं अपनाई गई।
बताया गया कि इस घटनाक्रम से कर्मचारियों में आक्रोश फैल गया। इसके बाद सफाई कर्मचारी संघ ने जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, मुख्य विकास अधिकारी, डीपीआरओ और समस्त एडीओ पंचायत को सूचना देकर अटल बिहारी प्रेक्षागृह में मतदान कराया। इस चुनाव में 1681 कर्मचारियों ने हिस्सा लिया, जिसमें अध्यक्ष पद पर पेशकार, मंत्री पद पर अतुल कुमार पाण्डेय, कोषाध्यक्ष पद पर रामकृपाल चौधरी, जिला संगठन मंत्री पद पर मोहम्मद सलीम तथा लेखा संप्रेक्षक पद पर राजकुमार का चयन किया गया। हालांकि प्रदेश कार्यकारिणी ने इस चुनाव को मान्यता देने से इनकार कर दिया है।
जिला मंत्री अतुल कुमार पाण्डेय ने बताया कि पूरे मामले की शिकायत 10 मार्च को डीपीआरओ से की गई थी और 11 मार्च को मुख्य विकास अधिकारी से मिलकर जांच की मांग की गई। मुख्य विकास अधिकारी ने डीपीआरओ को जांच कर आख्या देने के निर्देश दिए थे, लेकिन आरोप है कि जांच पूरी किए बिना ही डीपीआरओ ने विवादित जिलाध्यक्ष की सूची शासन को भेज दी।
उन्होंने कहा कि यदि इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो जाए तो दूध का दूध और पानी का पानी अलग हो जाएगा। अब सवाल उठ रहा है कि सीडीओ के निर्देश के बावजूद डीपीआरओ ने असली और नकली जिलाध्यक्ष की पहचान क्यों नहीं की। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि डीपीआरओ ने जानबूझकर फर्जी जिलाध्यक्ष अजय आर्या का नाम शासन को भेज दिया है।
मामले को लेकर शिकायतकर्ताओं ने उच्चाधिकारियों से निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
Leave a comment


