- इमामबाड़े पर दरूदो-फ़ातिहा, जगह-जगह सबील और लंगर का आयोजन, करबला के 72 शहीदों व अहले बैत को किया गया पुरसा
फतेहपुर। जनपद के सुल्तानपुर घोष कस्बे में नवीं मुहर्रम का पर्व गुरुवार को पूरी अकीदत, अनुशासन और ग़मगीन माहौल में मनाया गया। शाम से ही इमामबाड़े और ताजिया स्थलों पर अकीदतमंदों की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। लोगों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और करबला के 72 शहीदों की याद में दरूदो-फ़ातिहा पढ़ी, मन्नतें मांगीं और मुल्क में अमन, भाईचारे व खुशहाली की दुआएं की।
इमामबाड़े में धार्मिक रस्मों के बाद अंजुमन कमेटी सुल्तानपुर घोष के बच्चों और युवाओं ने ग़म-ए-हुसैन में नौहाख्वानी की। नौहों की सोज़भरी आवाज़ों के बीच अकीदतमंदों ने सीना ज़नी कर मातम किया और करबला के शहीदों तथा अहले बैत को पुरसा पेश किया। पूरा माहौल “या हुसैन” की सदाओं से गूंजता रहा और हर आंख नम दिखाई दी। शाम को दरूद और फातिहा के बाद परंपरागत रीति-रिवाजों के अनुसार ताजिया उठाया गया। ताजिया का जुलूस गांव के निर्धारित पारंपरिक मार्ग से निकाला गया। जुलूस के आगे-आगे मातमी दस्ते चलते रहे, जबकि पीछे बड़ी संख्या में अकीदतमंद शामिल होकर नौहे पढ़ते और मातम करते हुए आगे बढ़ते रहे। जुलूस के दौरान “नारे-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर” और “या हुसैन” की सदाओं से पूरा कस्बा गूंज उठा। इमामबाड़ा परिसर में अंजुमन कमेटी खागा के बच्चों ने अपने पारंपरिक कौशल का प्रदर्शन करते हुए बाना फेंकने और लकड़ी खेलने के हैरतअंगेज करतब दिखाए। उनके प्रदर्शन को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे। करतबों के दौरान सुरक्षा के पूरे इंतजाम किए गए थे और दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से बच्चों का उत्साहवर्धन किया। मुहर्रम के अवसर पर पूरे गांव में सेवा और इंसानियत की मिसाल भी देखने को मिली। विभिन्न स्थानों पर गांव वालों की ओर से शरबत, ठंडा पानी, कोल्ड ड्रिंक, पुलाव, बिस्किट और नमकीन का वितरण किया गया। जगह-जगह सबीलें लगाई गईं और लंगर का आयोजन कर सभी लोगों की सेवा की गई। बड़ी संख्या में लोगों ने लंगर में शामिल होकर प्रसाद ग्रहण किया। ताजिया जुलूस के दौरान पुलिस एवं प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद रहा। सुरक्षा व्यवस्था के बीच जुलूस शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। स्थानीय लोगों ने प्रशासन का सहयोग करते हुए परंपरा और अनुशासन के साथ कार्यक्रम को सफल बनाया। नवीं मुहर्रम के इस आयोजन ने एक बार फिर करबला की उस महान कुर्बानी की याद ताजा कर दी, जिसमें हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके 72 साथियों ने इंसानियत, सत्य और न्याय की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। अकीदतमंदों ने उसी पैगाम को याद करते हुए ग़म-ए-हुसैन मनाया और करबला के शहीदों को खिराज-ए-अकीदत पेश किया।


