खागा नगर पंचायत की हृदय स्थली (जी.टी. रोड और मुख्य बाजार) आज अव्यवस्था के दौर से गुजर रही है। डग्गामार वाहनों का जमावड़ा, फुटपाथों का अस्तित्व खत्म होना और प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी—ये सब मिलकर खागा की जनता को एक नारकीय जीवन की ओर धकेल रहे हैं।
शैलेश विश्वकर्मा की कलम से इस मुद्दे का तीखा और यथार्थवादी विश्लेषण:
खागा: जाम का जंजाल और ‘सिस्टम’ की सुस्ती
खागा नगर में जाम अब कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि यहाँ की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। इसके पीछे के कारणों और जिम्मेदारियों का लेखा-जोखा यहाँ दिया गया है:
1. प्रशासन की ‘सुविधाजनक’ खामोशी
जब भी कोई बड़ी दुर्घटना होती है, तो पुलिस और तहसील प्रशासन कुछ दिनों के लिए सक्रियता दिखाता है। सड़कों पर सफेद लाइन खींची जाती है, चेतावनी दी जाती है, लेकिन हफ्ता बीतते-बीतते सब पुराने ढर्रे पर लौट आता है। प्रशासन की यह ‘चुप्पी’ इशारा करती है कि या तो उनके पास इच्छाशक्ति की कमी है या फिर अतिक्रमणकारियों को राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है।
2. व्यापार मंडल: रक्षक या मूकदर्शक?
व्यापार मंडल का गठन व्यापारियों की समस्याओं के समाधान के लिए हुआ था, लेकिन आज यह संगठन केवल ‘फोटो खिंचवाने’ और ‘ज्ञापन देने’ तक सीमित नजर आता है।
दिक्कत कहाँ है? कई प्रभावशाली व्यापारी खुद अपनी दुकान का सामान फुटपाथ के पार सड़क तक फैला देते हैं।
जब प्रशासन कार्रवाई की कोशिश करता है, तो व्यापार मंडल इसे ‘व्यापारियों का उत्पीड़न’ बताकर ढाल बन जाता है। यदि व्यापार मंडल स्वयं अनुशासन और ‘सेल्फ-रेगुलेशन’ लागू करे, तो खागा की सड़कें आज सांस ले रही होतीं।
3. ‘कैंडल मार्च’ की राजनीति और नागरिक जिम्मेदारी
यह अत्यंत कड़वा सच है कि खागा में जब किसी की जान सड़क हादसे में जाती है, तो सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक कैंडल मार्च की बाढ़ आ जाती है। लेकिन:
”शोक संवेदना व्यक्त करना आसान है, पर नियमों का पालन करना कठिन।”
वही लोग जो मोमबत्तियां जलाते हैं, अक्सर गलत दिशा (Wrong side) में गाड़ी चलाते और बेतरतीब पार्किंग करते पाए जाते हैं। संवेदना तब तक सार्थक नहीं है जब तक वह व्यवस्था परिवर्तन का आधार न बने।
प्रमुख समस्याएँ जो खागा को निगल रही हैं:
अवैध स्टैंड: जी.टी. रोड और कोतवाली के आस-पास डग्गामार वाहनों ने अघोषित स्टैंड बना लिए हैं।
फुटपाथ का अंत: पैदल चलने वालों के लिए बनी जगह पर अब खोमचे, काउंटर और लोहे के जाल का कब्जा है।
ई-रिक्शा का आतंक: नगर में ई-रिक्शा की संख्या पर कोई नियंत्रण नहीं है, जिससे हर मोड़ पर ‘बॉटलनेक’ की स्थिति बनती है।
निष्कर्ष: समाधान की दरकार
खागा को इस जाम और अतिक्रमण से मुक्ति दिलाने के लिए अब ‘कागजी कार्रवाई’ नहीं, बल्कि ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की जरूरत है:
कड़ी घेराबंदी: फुटपाथ को लोहे की रेलिंग से सुरक्षित किया जाए ताकि दुकानदार बाहर सामान न रख सकें।
भारी जुर्माना: केवल चेतावनी नहीं, बल्कि आर्थिक दंड इतना भारी हो कि नियम तोड़ना घाटे का सौदा लगे।
पार्किंग व्यवस्था: नगर पंचायत को खाली पड़ी जमीनों को ‘पे एंड पार्क’ के रूप में विकसित करना चाहिए।
लेखक की अंतिम राय:
प्रशासन और व्यापार मंडल को यह समझना होगा कि अव्यवस्था की नींव पर व्यापार कभी फल-फूल नहीं सकता। आज जो अतिक्रमण आपको ‘मुनाफा’ लग रहा है, कल वही किसी के घर का चिराग बुझने का कारण बनेगा। खागा को कैंडल मार्च की नहीं, बल्कि एक साफ-सुथरी और सुरक्षित सड़क की जरूरत है।
ब्यूरो रिपोर्ट खागा उत्तर प्रदेश शैलेश विश्वकर्मा 9918881620


