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Reading: गाजीपुर थाना में ‘सिस्टम’ का खेल!खाकी की जुगलबंदी पर उठे सवाल, मोरम माफियाओं की कथित इंट्री बेनकाब
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Fatehpur

गाजीपुर थाना में ‘सिस्टम’ का खेल!खाकी की जुगलबंदी पर उठे सवाल, मोरम माफियाओं की कथित इंट्री बेनकाब

Dheerendra Kumar
Last updated: 2026/01/28 at 2:50 AM
Dheerendra Kumar Published January 28, 2026
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🚨➡️बुलेट–थार के रौब में वसूली का आरोप, महीनावारी और सेटिंग की जनचर्चा

➡️जीरो टॉलरेंस के दावों के बीच बेलगाम व्यवस्था?स्थानीय लोग बोले—“यहां न्याय नहीं, सिस्टम चलता है”
✍️ फतेहपुर ।गाजीपुर थाना क्षेत्र में इन दिनों कानून व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय लोगों और वाहन संचालकों के बीच चर्चाओं ने तूल पकड़ लिया है। आरोप है कि थाना क्षेत्र में तैनात दो सिपाहियों की कथित जुगलबंदी के सहारे मोरम से लदी ट्रैक्टर-ट्राला, मिट्टी खनन और अन्य अवैध गतिविधियों की इंट्री का पूरा ‘सिस्टम’ संचालित किया जा रहा है।स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां सब कुछ कथित तौर पर “लक्ष्मी” के इर्द-गिर्द सजा हुआ दिखाई देता है—जो सिस्टम में शामिल है, उसके लिए रास्ते आसान हैं और जो सवाल उठाता है, उसके लिए मुश्किलें।
एक अंदर, एक बाहर—ऐसे चलता है कथित ‘सिस्टम’?
सूत्रों के अनुसार,एक सिपाही थाने के भीतर रहकर कथित तौर पर अंदरूनी रूपरेखा तैयार करता है,जबकि दूसरा सिपाही महराज इलाके में बुलेट या थार जैसी गाड़ियों से घूमकर बाहरी मैनेजमेंट संभालता है। स्थानीय नागरिकों का दावा है कि इसी दोहरी भूमिका के चलते कई मामलों में थाना प्रभारी तक को वास्तविक स्थिति की पूरी जानकारी नहीं हो पाती , या फिर मामला कागज़ों में सामान्य दिखा दिया जाता है।मोरम और मिट्टी खनन में महीनवारी का आरोप वाहन संचालकों और ग्रामीणों के अनुसार,मोरम से जुड़ी ट्रैक्टर-ट्रॉली से पहले 15 से 30 हजार रुपये तक की मांग की जाती है,बाद में 5 हजार रुपये महीनवारी पर “सेटिंग” तय होने की चर्चा है।
❓ एक मोरम ट्रैक्टर चालक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया ,“जो तय रकम देता है, उसकी गाड़ी बेखौफ चलती है। जो नियम की बात करता है, उसे डराया जाता है। और आरटीओ खनिज की कार्यवाही बताकर पैसे वसूले जाते है इनकी शुरुवात तीस हजार से शुरू होती है और बाद में पंद्रह हजार में सेट कर गाड़ी को छोड़ दिया जाता है कई बार सीज कर चुप करा दिया जाता है।”
इसी तरह, मिट्टी खनन को लेकर भी 10 हजार रुपये महीनवारी की जनचर्चा है, जिसके बाद कथित तौर पर खुलेआम खनन होने की बात कही जा रही है।पीड़ित ही बन जाता है आरोपी?स्थानीय लोगों का आरोप है कि अगर कोई पीड़ित शिकायत लेकर थाने पहुंचता है, तो पहले उसी को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है,जबकि जिनका “सिस्टम सेट” होता है, उनके लिए कहानी का रुख बदल जाता है।
⭕ एक ग्रामीण ने बताया,
“पीड़ित को थकाकर समझा दिया जाता है। आखिर में वह न्याय की उम्मीद छोड़कर लौट जाता है।” रौब और दबदबा — खाकी की छवि पर सवाल इलाके में यह भी चर्चा है कि एक सिपाही महराज बिना नंबर प्लेट की बुलेट पर ‘खाकी’ लिखवाकर घूमता देखा जाता है, कभी बुलेट तो कभी थार—वाहन बदलते रहते हैं, लेकिन दबदबा कायम रहता है।लोगों का कहना है कि इस रौब के आगे कई लोग आवाज उठाने से कतराते हैं। सबसे बड़ा सवाल—कौन जिम्मेदार ?अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सब उच्च अधिकारियों की जानकारी में है?या फिर प्रोटोकॉल और भ्रम के सहारे वास्तविक स्थिति छिपी हुई है?क्या योगी सरकार की सख्त कानून व्यवस्था की नीति इन कथित गतिविधियों तक नहीं पहुंच पा रही?जनता को इंतजार—जांच या चुप्पी?क्षेत्र में जनचर्चा है कि यदि समय रहते निष्पक्ष और पारदर्शी जांच नहीं हुई, तो यह मामला सिर्फ गाजीपुर थाना तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी पुलिस व्यवस्था की साख पर असर डालेगा।फिलहाल जनता की निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं—क्या संज्ञान लिया जाएगा,या ‘सिस्टम’ यूं ही सवालों से ऊपर चलता रहेगा?

👇अगली कड़ी में अहम दस्तावेज़, तथ्यों और जमीनी साक्ष्यों के सामने आने की संभावना… ❓❓❓❓❓❓❓❓

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